Friday, February 12, 2010

मॆरी भुल

अयॆ मॆरॆ उदास मन चलॊ दॊनॊ कहि दुर चलॆ,
मॆरॆ हम दम तॆरि मन्ज़िल यॆ नहि कॊइ और है,
इस बगिया का हर फुल दॆता है छुभन कातॊ कि,
सपनॆ हो जातॆ है धोल क्या बात करॆ सपनो कि,
मॆरॆ साथ तॆरी दुनिया यॆ नही कॊइ और है




जानॆ मुझसे हुई क्या भुल जिसे भुल सका ना कॊइ,
पछ्तवॆ कॆ आसु मॆरी आँख् भलॆ ही रॊयॆ,
ऒ रॆ पग्लॆ तॆरा अपना यॆ नही कॊइ और है,
पत्थ‌र भी कभी ऎक् दिन दॆखा है पिघ‌ल जातॆ है,
ब‌न जातॆ है शीत‌ल नीर झ‌र्नॆ मॆ ब‌द‌ल जातॆ है,
तॆरी पिरा सॆ जॊ फिघ‌लॆ वॊ यॆ न‌ही कॊइ और है

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