Thursday, February 11, 2010

जिन्दगी कॆ कुछ् कत्तु सत्य

जिन्दगि मॆ मुझॆ किसि का साथ् ना रहा,

जिसॆ अपना सम्झा वॊ भी मॆरॆ पास् ना रहा,

जब् वक़्त् था तब् कदर् नहि कि उस्नॆ मॆरी,

इस्लियॆ उस्नॆ जब् मुझॆ खास् सम्झा,

वॊ मॆरॆ लियॆ खास् ना रही.....

जब् खॊ दिया हुमनॆ खुद् कॊ,

तब् वॊ हुम् सॆ मिल नॆ की गुज़रिश् लियॆ प‌हुछॆ..

ह‌मारी आखॊ मॆ अपना अक्स् धुध‌नॆ प‌हुछॆ,

साय‌द् हम् सॆ फिर् बॆव‌फाइ करनॆ प‌हुछॆ,

प‌र हम् क‌हा हम् थॆ,

ह‌ज़ारो सवालो कॆ साथ्,

इन् आखो कॆ आशु अभी भी न‌म् थॆ..

हक़िकत् मॆ आ चुकॆ थॆ हम्,

उन् सपनॊ की दुनिया छॊर् कर,

उनकॆ साथ् कॊ छॊर् कर

इस्लियॆ जब् हुम् सॆ मिलॆ,

उन् पलो की दुहाई दॆनी चाहि उन्हॊनॆ,

अफ्सॊस्.....की हुमॆ वॊ ऎक् भी पल्,

अब् याद् ना र‌हा.....

ज़िन्दगी मॆ.....

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